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‘छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले पर तीखी टिप्पणी; हत्या के दोषी की सजा घटाकर 10 साल करने के मामले में जवाब तलब

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के एक फैसले पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि जब न्यायाधीशों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 304 के भाग-I और भाग-II के बीच का अंतर ही नहीं पता, तो उनसे साक्ष्यों का सही मूल्यांकन करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। अदालत ने कहा कि ये कानून के ऐसे बुनियादी सिद्धांत हैं, जिन्हें विधि महाविद्यालयों में पहले साल ही पढ़ाया जाता है।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह टिप्पणी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस फैसले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें हत्या के एक दोषी की सजा कम कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया।

जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रजनी दुबे की पीठ ने दिया था फैसला

यह मामला चिंतामणि उर्फ चिंटू पटेल बनाम छत्तीसगढ़ राज्य से संबंधित है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रजनी दुबे की खंडपीठ ने 29 नवंबर 2024 को आपराधिक अपील क्रमांक 1661/2022 में फैसला सुनाया था। इस फैसले में आरोपी की दोषसिद्धि को आईपीसी की धारा 302 से बदलकर धारा 304 के भाग-II के तहत कर दिया गया था और आजीवन कारावास की सजा घटाकर 10 साल के कठोर कारावास में बदल दी गई थी।

‘यह पहली बार नहीं है’

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने टिप्पणी की कि हाईकोर्ट ने फैसले में कानून के बुनियादी पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। अदालत के अनुसार, ऐसा प्रतीत होता है कि हाईकोर्ट ने चोटों की प्रकृति, वारदात में इस्तेमाल किए गए हथियार और घटना की परिस्थितियों को उचित महत्व नहीं दिया।

पीठ ने कहा, “हाईकोर्ट की दयनीय स्थिति देखिए। न्यायाधीशों को यह नहीं पता कि आईपीसी की धारा 304 का भाग-I और भाग-II क्या है। और आप उम्मीद करते हैं कि न्यायाधीश साक्ष्यों की सराहना करेंगे!”

अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह का फैसला उसके सामने पहली बार नहीं आया है। पीठ ने रेखांकित किया कि ये कानून के ऐसे बुनियादी सिद्धांत हैं, जिन्हें विधि महाविद्यालयों में पढ़ाई के पहले वर्ष में ही सिखाया जाता है।

हत्या की सजा बहाल करने पर विचार

सत्र न्यायालय ने आरोपी को आईपीसी की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई के बाद अपराध को धारा 304 भाग-II के तहत माना और सजा घटा दी।

सुप्रीम कोर्ट ने अब आरोपी को नोटिस जारी कर पूछा है कि हाईकोर्ट का आदेश निरस्त कर सत्र न्यायालय द्वारा हत्या के अपराध में सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा बहाल क्यों नहीं की जानी चाहिए।

मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अभी अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। हाईकोर्ट के निर्णय को रद्द करने और हत्या की सजा बहाल करने के प्रश्न पर संबंधित पक्षों का जवाब सुनने के बाद विचार किया जाएगा।

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