विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग ने एक बार फिर अपने निर्देशों में बदलाव किया है। आयोग ने उन मतदाताओं को दोबारा नाम जुड़वाने का अवसर दिया है, जिनके नाम अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लीकेट (ASDD) श्रेणी में डालकर ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए थे।

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जिन आवेदकों के नाम बहाल किए जाएंगे, उन्हें उनका पुराना EPIC (वोटर आईडी) नंबर ही दिया जाएगा। इससे स्पष्ट होता है कि आयोग उन्हें नए मतदाता के रूप में नहीं, बल्कि पहले से पंजीकृत मतदाताओं के रूप में मान्यता दे रहा है।

6 नवंबर 2026 को जारी निर्देश के मुताबिक, दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, झारखंड, तेलंगाना और नगालैंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को इन मतदाताओं के लिए नई प्रक्रिया शुरू करने को कहा गया है।

आयोग ने संबंधित राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को निर्देश दिया है कि ऐसे सभी मतदाताओं की बूथवार सूची संबंधित मतदान केंद्रों के नोटिस बोर्ड पर दोबारा प्रदर्शित की जाए। इनमें वे मतदाता शामिल हैं जिन्हें अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लीकेट चिह्नित किया गया था और जिनके एन्यूमरेशन फॉर्म वापस प्राप्त नहीं हुए थे। इसी कारण उनके नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सके थे।

आंकड़ों के लिहाज से यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण है। इन चार श्रेणियों के मतदाताओं की संख्या लगभग 13 करोड़ बताई गई है, जबकि SIR के दौरान कुल 13.4 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए थे। यानी हटाए गए मतदाताओं में लगभग 97 प्रतिशत इन्हीं श्रेणियों में आते हैं।

पहले से पंजीकृत मतदाताओं से Form 6 भरवाने पर विवाद

चुनाव आयोग के इस नए निर्देश के साथ ही SIR के दौरान पहले से पंजीकृत मतदाताओं को Form 6 भरने के लिए कहे जाने का विवाद भी फिर चर्चा में आ गया है।

ड्राफ्ट मतदाता सूची में नाम नहीं मिलने पर कई ऐसे नागरिकों को Form 6 भरने के लिए कहा गया, जो पहले से मतदाता थे और जिनके पास वैध EPIC नंबर भी था। Form 6 मूल रूप से पहली बार मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए निर्धारित है। इसके आवेदन में व्यक्ति को यह घोषणा करनी होती है कि उसका नाम किसी अन्य निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में पहले से दर्ज नहीं है।

इस तरह पहले से पंजीकृत मतदाताओं को अपना नाम दोबारा जुड़वाने के लिए नए मतदाता के रूप में आवेदन करने की स्थिति में डाल दिया गया। सवाल यह है कि जिन नागरिकों का नाम पहले से मतदाता सूची में था, उन्हें अपनी पहचान और पूर्व पंजीकरण के आधार पर नाम बहाल कराने के बजाय पहली बार पंजीकरण कराने वाली प्रक्रिया से क्यों गुजरना पड़ा?

गलत घोषणा पर एक साल की सजा का प्रावधान

इस विवाद का कानूनी पहलू भी गंभीर है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत मतदाता सूची तैयार करने या संशोधित करने से संबंधित किसी घोषणा में जानबूझकर गलत जानकारी देना दंडनीय है। इसके लिए एक साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।

Form 6 में दी जाने वाली घोषणा और धारा 31 के इस प्रावधान को देखते हुए सवाल उठता है कि पहले से पंजीकृत मतदाताओं को ऐसा फॉर्म भरने के लिए कहकर आयोग ने उन्हें किस तरह की कानूनी असमंजस की स्थिति में डाल दिया था।

3 नवंबर को आयोग ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा था कि केवल इस आधार पर कि कोई पहले से पंजीकृत मतदाता होने के बावजूद SIR के ड्राफ्ट में नाम नहीं आने के कारण Form 6 भरता है, उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी। हालांकि यह राहत निर्धारित शर्तों के अधीन है। इस स्पष्टीकरण के बाद भी मूल सवाल खत्म नहीं होता कि ऐसे नागरिकों को Form 6 भरने की नौबत ही क्यों आई।

आयोग से उठ रहे हैं कई सवाल

6 नवंबर के नए निर्देश में पुराने EPIC नंबर के आधार पर दोबारा एन्यूमरेशन फॉर्म भरने की व्यवस्था से यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि पहले Form 6 भर चुके मतदाताओं के साथ अब क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी। क्या उन्हें भी उनका पुराना EPIC नंबर और पूर्व मतदाता पंजीकरण का रिकॉर्ड बहाल किया जाएगा? क्या उनके Form 6 आवेदनों को नई व्यवस्था के अनुरूप समायोजित किया जाएगा? आयोग ने इस संबंध में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं की है।

इसके अलावा यह भी पूछा जा रहा है कि जब Form 8 के जरिए मतदाता सूची में सुधार और पते में बदलाव की व्यवस्था पहले से मौजूद है, तो पहले से पंजीकृत नागरिकों को नए मतदाता के रूप में Form 6 भरने की जरूरत क्यों पड़ी?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ये नागरिक पहले से वैध मतदाता थे और अब आवेदन स्वीकार होने पर उन्हें उनका पुराना EPIC नंबर ही लौटाया जाना है, तो उन्हें मतदाता सूची से बाहर करने और फिर नए सिरे से पंजीकरण की प्रक्रिया में धकेलने की जिम्मेदारी किसकी है?

चुनाव आयोग का काम नागरिकों के मतदान के अधिकार की रक्षा करना है। ऐसे में करोड़ों मतदाताओं के नाम हटने, उन्हें दोबारा पंजीकरण के लिए मजबूर किए जाने और गलत घोषणा पर कानूनी सजा के प्रावधान के बीच पैदा हुई स्थिति ने आयोग की SIR प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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