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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्रकार सत्य‍म वर्मा की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान हिरासत के आधार में इस्तेमाल किए गए ‘आंदोलनजीवी’ शब्द पर गंभीर सवाल उठाया।

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने गुरुवार को मामले की सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया। दो दिन, 7 और 8 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान पीठ ने अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल से पूछा कि सरकारी हिरासत दस्तावेज में इस तरह की शब्दावली आखिर कैसे पहुंची।

न्यायमूर्ति श्रीधरन ने पूछा, “यह ‘आंदोलनजीवी’ शब्द कहां से आया? यह किसी आधिकारिक दस्तावेज में कैसे आ गया?”

वर्मा को गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम ने 12 मई 2026 को NSA की धारा 3(2) और 3(3) के तहत निरुद्ध किया था। यह कार्रवाई अप्रैल 2026 में नोएडा में श्रमिकों के प्रदर्शन और कथित हिंसा के सिलसिले में की गई थी।

विचारधारा और साहित्य को बनाया आधार?

सुनवाई के दौरान पीठ ने हिरासत आदेश और वर्मा को दिए गए हिरासत के आधारों का अवलोकन किया। न्यायमूर्ति श्रीधरन ने यह भी सवाल उठाया कि जिलाधिकारी ने वर्मा की विचारधारा, साहित्य और किसी संगठन से कथित संबंध को निवारक हिरासत का आधार क्यों बनाया।

पीठ की आपत्ति का सार यह था कि केवल किसी विशेष विचारधारा को मानना या साहित्य रखना अपने आप में निवारक हिरासत का आधार कैसे बन सकता है।

हिरासत के आधार में नोएडा में औद्योगिक अशांति और हिंसा से निवेश, रोजगार तथा औद्योगिक विकास प्रभावित होने की आशंका जताई गई है। दस्तावेज में कहा गया है कि लगातार हिंसा से निवेशकों और उद्योगपतियों में भय पैदा हो सकता है तथा औद्योगिक वातावरण प्रभावित हो सकता है।

इसी दस्तावेज में वर्मा को ‘अतार्किक व हठी हिंसक आंदोलनजीवी’ बताते हुए आरोप लगाया गया है कि वह ऐसी परिस्थितियों के योजनाकार हैं, जिनसे लोक-विक्षोभ और औद्योगिक अशांति पैदा होती है।

आरडब्ल्यूपीआई से संबंध का भी उल्लेख

हिरासत के आधार में वर्मा के रिवोल्यूशनरी वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया (आरडब्ल्यूपीआई) से कथित संबंधों का भी उल्लेख किया गया है। आरोप है कि संगठन की गतिविधियों और साहित्य के जरिए युवाओं को प्रभावित कर हिंसक गतिविधियों की ओर प्रेरित किया गया।

दस्तावेज में ‘मास कम्युनिकेशन के जरिए नैरेटिव तैयार करने’ का भी आरोप लगाया गया है। इसके अनुसार इसका उद्देश्य श्रमिकों और आम लोगों में ‘राज्य विरोधी और प्रशासन विरोधी सोच’ पैदा करना तथा सार्वजनिक शांति भंग करना था।

सरकार ने इन्हीं परिस्थितियों को आधार बनाकर वर्मा के खिलाफ NSA लगाने को उचित ठहराया है।

सोशल मीडिया पोस्ट से हिरासत के आधार कॉपी करने का आरोप

वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस ने आरोप लगाया कि हिरासत का आधार तैयार करते समय उनकी राजनीतिक विचारधारा, आरडब्ल्यूपीआई से कथित जुड़ाव तथा साहित्य और अनुवाद संबंधी काम को अपराध की तरह पेश किया गया।

याचिका में एक गंभीर आरोप यह भी है कि 12 मई के हिरासत के आधार 14 अप्रैल 2026 को ‘द क्रोनोलॉजी’ नामक एक्स/ट्विटर हैंडल पर प्रकाशित एक सोशल मीडिया थ्रेड की सीधे, बिना सत्यापन और शब्दशः नकल हैं।

याचिका के अनुसार 9 मई को पुलिस स्टेशन फेज-2 के इंस्पेक्टर द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट भी कथित तौर पर उसी सोशल मीडिया थ्रेड से “कट, कॉपी और पेस्ट” की गई थी।

वर्मा की याचिका में इस थ्रेड को राजनीतिक रूप से प्रेरित षड्यंत्र सिद्धांत बताते हुए आरोप लगाया गया है कि इसमें नोएडा के न्यूनतम मजदूरी विवाद को मुंबई के गाजा समर्थन प्रदर्शनों, सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलनों, दिल्ली प्रदूषण विरोधी प्रदर्शनों और भगत सिंह जन अधिकार यात्रा जैसी अलग-अलग घटनाओं से जोड़ने का प्रयास किया गया।

13 अप्रैल की हिंसा में शामिल होने के आरोप से भी इनकार

गोंसाल्वेस ने अदालत में यह भी तर्क दिया कि हिरासत आदेश इस धारणा पर आधारित है कि वर्मा 13 अप्रैल को नोएडा में हुई हिंसा में शामिल थे। जबकि याचिका के अनुसार सीसीटीवी फुटेज उन्हें उस समय लखनऊ में दिखाता है।

याचिका में दावा किया गया है कि 13 अप्रैल को करीब 2:13 बजे वर्मा के लखनऊ में होने का सीसीटीवी फुटेज मौजूद है और इसके कुछ ही समय बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया था। उनके मोबाइल के कॉल डिटेल रिकॉर्ड को भी कथित तौर पर इस अलिबी के समर्थन में पेश किया गया है।

याचिका में यह भी आरोप है कि हिरासत प्राधिकारी के समक्ष इन सामग्रियों को नहीं रखा गया, जबकि किसी अन्य आरोपी का सीडीआर प्रस्तुत किया गया।

वर्मा का यह भी दावा है कि हिरासत के लिए जिन 11 एफआईआर को आधार बनाया गया, उनमें से किसी में भी उनका नाम नहीं था।

पत्रकारिता और विचारधारा को अपराध नहीं बनाया जा सकता : बचाव

गोंसाल्वेस ने दलील दी कि अकादमिक अध्ययन, पत्रकारिता, लेखन और वैचारिक विश्वास संविधान के तहत संरक्षित गतिविधियां हैं। केवल भाषण या विचार को आपराधिक कार्रवाई का आधार तभी बनाया जा सकता है जब उसका हिंसा के लिए उकसावे से आवश्यक संबंध स्थापित हो।

बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि निवारक हिरासत एक असाधारण शक्ति है और इसका इस्तेमाल सामान्य आपराधिक न्याय व्यवस्था का विकल्प बनने या नियमित जमानत प्रक्रिया को निष्प्रभावी करने के लिए नहीं किया जा सकता।

याचिका में हिरासत प्राधिकारी की ‘व्यक्तिपरक संतुष्टि’ को भी चुनौती दी गई है और कहा गया है कि उपलब्ध सामग्री वर्मा को कथित हिंसा से जोड़ने वाला आवश्यक संबंध स्थापित नहीं करती।

याचिका में एडवाइजरी बोर्ड के समक्ष वर्मा के प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रक्रियागत मुद्दों तथा 26 मई 2026 को जारी अतिरिक्त हिरासत आधारों को भी चुनौती दी गई है।

वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस के साथ अधिवक्ता अभिषेक द्विवेदी, दीक्षा द्विवेदी और माणिक गुप्ता उपस्थित हुए।

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