सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को संभल हिंसा मामले के आरोपी मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए), 1980 के तहत निवारक हिरासत को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को भी निरस्त कर दिया, जिसमें हिरासत आदेश को बरकरार रखा गया था। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का हर्जाना भी लगाया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस हिरासत में कथित तौर पर दिए गए इकबालिया बयान को निवारक हिरासत का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत के अनुसार, केवल ऐसे कथित कबूलनामे के आधार पर एनएसए के तहत हिरासत का आदेश टिकाऊ नहीं है।
मामला नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद के अदालत के आदेश पर हुए सर्वेक्षण के बाद हुई हिंसा से जुड़ा है, जिसमें चार लोगों की मौत हुई थी। अफरोज को घटना के करीब 54 दिन बाद गिरफ्तार किया गया था। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दी, लेकिन उत्तर प्रदेश प्रशासन ने 13 अक्टूबर 2025 को उनके खिलाफ एनएसए के तहत निवारक हिरासत का आदेश जारी कर दिया। हाईकोर्ट ने इस आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया, जिसके बाद अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट में अफरोज की ओर से दलील दी गई थी कि पुलिस हिरासत में कथित इकबालिया बयान कानूनी आधार नहीं बन सकता और केवल आपराधिक मामलों की मौजूदगी किसी व्यक्ति की निवारक हिरासत को उचित नहीं ठहरा सकती। वहीं, राज्य सरकार ने दलील दी कि उनकी रिहाई से दोबारा हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी।
अदालत ने मुल्ला अफरोज की आपराधिक मामले में दोषसिद्धि या निर्दोषता पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। उसका फैसला इस मामले में एनएसए के तहत की गई निवारक हिरासत की वैधता तक सीमित है।

