पूर्व केंद्रीय गृह सचिव और पूर्व केंद्रीय मंत्री राज कुमार सिंह ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। देशवासियों के नाम जारी अपने खुले पत्र में सिंह ने आरोप लगाया कि एसआईआर के माध्यम से चुनावी कानून और निर्धारित प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया गया है तथा बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के मताधिकार पर असर पड़ा है।
सिंह ने कहा कि यदि देश लोकतंत्र बना रहना चाहता है तो नागरिकों को यह समझना होगा कि एसआईआर के नाम पर क्या किया जा रहा है। उन्होंने प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 और 22 का हवाला देते हुए दावा किया कि विशेष पुनरीक्षण केवल विशेष परिस्थितियों में और निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया जा सकता है। उनके अनुसार, पूरे देश में गहन पुनरीक्षण का आदेश देना कानून की मूल भावना के विपरीत था।
मतदाता सूची से नाम हटाने पर सवाल
सिंह ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची से नाम हटाने का अधिकार संबंधित निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) को है और इसके लिए जांच, संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर तथा निर्धारित अपील प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। उनका दावा है कि 2003 के बाद मतदाता सूची में शामिल किए गए अनेक लोगों के नाम बिना व्यक्तिगत जांच और बिना कारण बताओ नोटिस के हटाए गए।
उन्होंने उच्चतम न्यायालय के लाल बाबू हुसैन एवं अन्य बनाम निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी एवं अन्य मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी मतदाता की पात्रता पर सवाल उठाने वाले पक्ष या प्राधिकारी को उसके दावे के समर्थन में सामग्री प्रस्तुत करनी होती है; मतदाता पर अपनी पात्रता साबित करने का पूरा बोझ नहीं डाला जा सकता।
सिंह ने आरोप लगाया कि एसआईआर के दौरान इसके विपरीत व्यवस्था अपनाई गई और नाम हटाए जाने के बाद संबंधित लोगों को नए मतदाता के रूप में आवेदन करने तथा अपनी पात्रता के दस्तावेज देने के लिए कहा गया।
‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ पर भी आपत्ति
पूर्व गृह सचिव ने ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर मतदाताओं के नामों को बाहर किए जाने पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि गरीब और ग्रामीण परिवारों में जन्मतिथि का सटीक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने के कारण कई लोगों ने मतदाता सूची में अपनी अनुमानित जन्मतिथि दर्ज कराई थी।
सिंह के अनुसार, पिता और संतान की दर्ज आयु में अंतर को तकनीकी आधार पर ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ मानकर नाम हटाना अनुचित है, खासकर तब जब संबंधित व्यक्ति से व्यक्तिगत जांच या सुनवाई की प्रक्रिया पूरी न की गई हो।
युवाओं और प्रवासी श्रमिकों पर प्रभाव का दावा
सिंह ने एसआईआर में फॉर्म-6 के साथ जोड़े गए अतिरिक्त परिशिष्ट पर भी सवाल उठाया। उनके अनुसार, इसमें आवेदकों से 2003 की मतदाता सूची में उनके माता-पिता के नाम का क्रमांक बताने को कहा गया। उन्होंने सवाल किया कि 18 वर्ष का कोई नया मतदाता वर्ष 2026 में 2003 की मतदाता सूची तक आसानी से कैसे पहुंच सकता है।
उन्होंने दावा किया कि इस तरह की शर्तों से नए और युवा मतदाताओं के पंजीकरण में बाधा उत्पन्न हुई।
सिंह ने प्रवासी श्रमिकों की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि लाखों लोग रोजगार के लिए अपने गृह राज्यों से दूर रहते हैं। उनके अनुसार, ऐसे श्रमिकों के लिए जटिल प्रपत्र भरना, दस्तावेज जुटाना और अपने गांव लौटकर मतदाता सूची में नाम दर्ज कराना आर्थिक रूप से कठिन हो सकता है।
फॉर्म-7 और बड़ी संख्या में आपत्तियों पर सवाल
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने फॉर्म-7 के जरिए मतदाता नामों पर कथित रूप से बड़े पैमाने पर आपत्तियां दाखिल किए जाने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि इन आपत्तियों को किसने दाखिल किया, उन्हें किस आधार पर स्वीकार किया गया और जिन लोगों ने आपत्तियां दाखिल कीं, उनके सामने आए बिना उन पर कार्रवाई कैसे की गई।
उन्होंने पश्चिम बंगाल में करीब 16 लाख मतदाताओं के नामों को लेकर भी सवाल उठाया और दावा किया कि निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों द्वारा पात्र पाए गए लोगों के नाम दर्ज नहीं किए गए क्योंकि निर्वाचन आयोग की ओर से उनके संबंध में अपीलें की गई थीं। सिंह ने पूछा कि इन अपीलों का निर्णय किस स्तर पर और किसके अधिकार से लिया गया।
निर्वाचन प्रक्रिया के केंद्रीकरण का आरोप
सिंह ने मतदाता सूची के संशोधन को केंद्रीकृत किए जाने को भी गंभीर विषय बताया। उनका दावा है कि कानून के अनुसार मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का अधिकार निर्धारित निर्वाचन अधिकारियों के पास है, लेकिन एसआईआर में प्रक्रिया को केंद्रीय स्तर पर संचालित किया गया।
उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था भविष्य में मतदाता सूची को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है। हालांकि, इस संबंध में उन्होंने सवाल के रूप में पूछा कि क्या ऐसा किसी विशेष राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में हुआ है।
13 करोड़ नाम हटाए जाने के दावे पर भी सवाल
खुले पत्र में सिंह ने दावा किया कि एसआईआर के तहत अब तक 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जा चुके हैं, जो कुल मतदाताओं का लगभग 13 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि यदि यह आंकड़ा सही है तो इसका चुनावी प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।
यह आंकड़ा और इसके आधार पर किए गए निष्कर्ष निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों से स्वतंत्र रूप से सत्यापित किए जाने की आवश्यकता रखते हैं।
‘किसके निर्देश पर लिए गए फैसले?’
सिंह ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर कई सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि एसआईआर से संबंधित निर्णय पूरे निर्वाचन आयोग ने लिया था या केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि दो निर्वाचन आयुक्तों ने कुछ निर्णयों का विरोध किया था, तो संबंधित निर्णय किस अधिकार के तहत लागू किए गए। सिंह ने आयोग की निर्णय प्रक्रिया और उसके भीतर अधिकारों के इस्तेमाल में पारदर्शिता की मांग की।
आपराधिक कार्रवाई और निर्वाचन सुधार की मांग
सिंह ने कहा कि केवल महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करना पर्याप्त नहीं होगा और विपक्षी दलों द्वारा महाभियोग की बात किए जाने के संदर्भ में उन्होंने आपराधिक मामलों की मांग की।
उन्होंने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की वकालत करते हुए प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और उच्चतम न्यायालय के एक मौजूदा न्यायाधीश वाली चयन समिति की व्यवस्था को बहाल करने की मांग की।
उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के स्थान पर मतपत्र से चुनाव कराने की भी मांग की और कहा कि किसी भी इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली को पूरी तरह हैक-रोधी नहीं माना जा सकता। इस दावे पर भी तकनीकी और संस्थागत विशेषज्ञों तथा निर्वाचन आयोग के आधिकारिक रुख को अलग से देखना आवश्यक है।
राज कुमार सिंह ने अंत में कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए देशभर में इस मुद्दे पर जागरूकता और एकजुटता जरूरी है। उन्होंने एसआईआर पर उच्चतम न्यायालय के फैसले तथा निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े मामले में कथित देरी पर भी सवाल उठाए।
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