देश तब तक वास्तव में स्वतंत्र नहीं कहा जा सकता, जब तक उसकी न्यायपालिका स्वतंत्र और निडर न हो। दुर्भाग्य से आज नागरिकों की स्वतंत्रता के उल्लंघन के कई मामलों में अदालतें मूकदर्शक बनी हुई हैं। प्रक्रिया ही सजा बन गई है और लोगों को राष्ट्रविरोधी बताकर उनका जीवन बर्बाद किया जा रहा है। यह गंभीर टिप्पणी सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता ने की है।

न्यायमूर्ति गुप्ता ने न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया, न्यायिक स्वतंत्रता, बार की भूमिका और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को लेकर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीनों में सर्वोच्च न्यायालय में कई नियुक्तियां हुई हैं और उच्च न्यायालयों के कुछ मुख्य न्यायाधीशों को भी सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्त किया गया है। उनके अनुसार इनमें लगभग सभी उच्च जातियों से आते हैं और बड़ी संख्या ब्राह्मणों की है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि वह नियुक्त किए गए किसी व्यक्ति की योग्यता या ईमानदारी पर सवाल नहीं उठा रहे हैं। लेकिन उनका कहना है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय पूरे देश का सर्वोच्च न्यायालय है तो उसमें समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व दिखाई देना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश में अन्य समुदायों और धर्मों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है तथा उच्च न्यायालयों के वरिष्ठ न्यायाधीशों में भी ऐसे अनेक पुरुष और महिलाएं हैं जिनकी ईमानदारी और क्षमता पर कोई सवाल नहीं है।

‘महाविद्यालय प्रणाली पूरी तरह अपारदर्शी’

न्यायमूर्ति गुप्ता ने न्यायाधीशों की नियुक्ति की मौजूदा महाविद्यालय प्रणाली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था विफल हो चुकी है और पूरी तरह अपारदर्शी बन गई है। महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं, लेकिन उनके कारण सार्वजनिक नहीं किए जाते।

उन्होंने कहा कि न्यायिक विवादों के निपटारे में भारी खर्च और लंबा समय लगने के बावजूद देश की जनता ने न्यायपालिका पर गहरा विश्वास कायम रखा है। हालांकि, यह विश्वास अब कमजोर पड़ रहा है। सामाजिक माध्यमों के दौर में न्यायाधीश लगातार जनता की निगाह में हैं, फिर भी आज भी विधायिका और कार्यपालिका की तुलना में बड़ी संख्या में लोग न्यायपालिका पर अधिक भरोसा करते हैं।

स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए स्वतंत्र अधिवक्ता समुदाय जरूरी

न्यायमूर्ति गुप्ता ने अधिवक्ता समुदाय की स्वतंत्रता पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र न्यायपालिका तभी संभव है, जब अधिवक्ता समुदाय भी स्वतंत्र हो। वकीलों को राजनीतिक संबद्धता और जातीय पहचान से ऊपर उठकर नागरिकों के अधिकारों के लिए खड़ा होना चाहिए और सत्ता के सामने आवाज उठानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि वकीलों की फीस में भारी वृद्धि हुई है, जबकि निःशुल्क कानूनी सहायता के लिए किए जाने वाले काम में भारी गिरावट आई है। उन्होंने बार के सदस्यों से आत्ममंथन करने को कहा कि क्या वे वास्तव में स्वतंत्र हैं।

बार परिषदों की भूमिका पर भी सवाल

न्यायमूर्ति गुप्ता ने भारतीय बार परिषद के अध्यक्ष द्वारा असहमति की आवाज उठाने वाले छात्रों को कथित तौर पर धमकाने का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि बार परिषदों का प्रमुख दायित्व अनुशासनहीन वकीलों के खिलाफ कार्रवाई करना और कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता को उच्च स्तर पर बनाए रखना है।

उनके अनुसार दोनों मोर्चों पर व्यवस्था बुरी तरह विफल रही है। कुछ संस्थानों को छोड़ दें तो देश के अधिकांश विधि महाविद्यालयों में शिक्षा का स्तर अपेक्षा से काफी नीचे है। वहीं, कानूनी आचार-संहिता का उल्लंघन करने और पेशे की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले वकीलों के खिलाफ लगभग कोई कार्रवाई नहीं होती।

अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता का अधिकार

न्यायमूर्ति गुप्ता ने कहा कि प्रत्येक भारतीय नागरिक के सबसे महत्वपूर्ण मानवाधिकारों में से एक स्वतंत्रता का अधिकार है, जिसकी गारंटी संविधान के अनुच्छेद 21 में दी गई है। इसके बावजूद इस अधिकार का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है और कई मामलों में अदालतें मूकदर्शक बनी हुई हैं।

उन्होंने कहा कि यह न तो संविधान की प्रस्तावना में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व है और न ही वह आजादी है जिसके लिए देश के नेताओं ने संघर्ष किया था।

असहमति और विरोध लोकतंत्र का हिस्सा

न्यायमूर्ति गुप्ता ने असहमति के अधिकार को लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि अपने विचारों को स्वतंत्र रूप से और बिना भय व्यक्त करना मौलिक अधिकार होने के साथ-साथ लोकतंत्र के लिए भी जरूरी है।

उन्होंने कहा कि विरोध प्रदर्शन से आम लोगों को कुछ असुविधा होना स्वाभाविक है। कोई भी प्रभावी विरोध प्रदर्शन बिना किसी असुविधा के संभव नहीं है। ऐसे में उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि अब न्यायाधीश भी यह सुझाव देने लगे हैं कि विरोध प्रदर्शनों को किस तरह सीमित किया जाना चाहिए।

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि न्यायाधीश ही विरोध को सीमित करने के उपाय सुझाएंगे तो क्या ऐसे न्यायाधीश किसी नागरिक के असहमति के अधिकार की रक्षा कर पाएंगे?

‘काली भेड़ों’ की संख्या बढ़ रही

न्यायमूर्ति गुप्ता ने कहा कि न्यायपालिका में अधिकांश न्यायाधीश ईमानदार और निष्ठावान हैं, लेकिन ‘काली भेड़ों’ की संख्या बढ़ रही है। उन्होंने उच्च स्तर के न्यायाधीशों से आत्ममंथन करने का आह्वान किया कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों पैदा हो रही है।

उन्होंने न्यायपालिका की खोई हुई प्रतिष्ठा और जनता के विश्वास को फिर हासिल करने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत बताई। उनके अनुसार यह काम संभव भी है और जरूरी भी, क्योंकि यदि जनता का न्यायपालिका से विश्वास उठ गया तो न्यायपालिका स्वयं अप्रासंगिक हो जाएगी।

उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी स्थिति लोकतांत्रिक भारत के लिए बेहद गंभीर खतरा होगी। जहां लोकतंत्र नहीं होता, वहां जनता कभी स्वतंत्र और स्वाधीन नहीं रह सकती।

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