भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) से जुड़े एक नए आरटीआई जवाब ने बड़े कर्जदारों के खराब ऋणों की वसूली को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मनीलाइफ की रिपोर्ट के अनुसार, एसबीआई ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (एनसीएलटी) के जरिए निपटाए गए मामलों में करीब ₹1 लाख करोड़ की रकम छोड़ दी, जबकि ₹100 करोड़ से अधिक के बड़े कर्जदारों के खातों में कुल ₹1.52 लाख करोड़ का ऋण राइट-ऑफ किया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, आरटीआई कार्यकर्ता विवेक वेलणकर ने एसबीआई से उन कर्जदारों के नाम मांगे थे, जिनके ₹100 करोड़ से अधिक के ऋण अलग-अलग वित्तीय वर्षों में राइट-ऑफ किए गए, साथ ही प्रत्येक खाते में राइट-ऑफ की राशि की जानकारी भी मांगी गई थी।
लेकिन एसबीआई ने नाम देने से इनकार कर दिया। बैंक ने इसे तीसरे पक्ष की ‘व्यक्तिगत सूचना’, बैंक के पास विश्वासगत क्षमता में रखी गई सूचना और व्यावसायिक गोपनीयता बताते हुए आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(d), 8(1)(e) और 8(1)(j) का हवाला दिया।
एनसीएलटी में कितना नुकसान?
आरटीआई जवाब के अनुसार, बड़े कर्जदारों से जुड़े एनसीएलटी दावों में करीब 67% का हेयरकट स्वीकार किया गया। यानी जिन रकमों की वसूली के लिए मामले एनसीएलटी में ले जाए गए, उनमें से बहुत बड़ी राशि बैंक को छोड़नी पड़ी।
इसके अलावा, ₹1.52 लाख करोड़ के राइट-ऑफ किए गए बड़े कर्ज खातों में बैंक की वास्तविक वसूली केवल लगभग 14% रही।
सबसे बड़ा सवाल—नाम सार्वजनिक क्यों नहीं?
वेलणकर ने एसबीआई के जवाब पर सवाल उठाते हुए कहा कि बैंक ने 2020 में उन्हीं नामों की जानकारी उन्हें शेयरधारक के रूप में उपलब्ध कराई थी, जबकि अब आरटीआई के तहत वही जानकारी देने से इनकार किया जा रहा है। उनके मुताबिक यह बैंक के रुख में स्पष्ट विरोधाभास है।
मुद्दा केवल बैंकों द्वारा ऋण माफ करने या राइट-ऑफ करने का नहीं है। राइट-ऑफ का अर्थ अपने आप में कर्ज की कानूनी माफी नहीं होता—लेकिन जब बड़े कर्जदारों के मामलों में भारी हेयरकट स्वीकार किए जाते हैं और वसूली बेहद कम रहती है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सार्वजनिक धन के नुकसान के लिए जिम्मेदारी किसकी तय होती है।
रिपोर्ट के अनुसार, आरटीआई से सामने आए आंकड़े इस बात पर भी सवाल उठाते हैं कि बड़े कर्जदारों के मामले में बैंक, भारतीय रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं।
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