दस साल में बड़े कर्जदारों के 26,701 करोड़ रुपये बट्टे खाते में, वसूली सिर्फ 3,874 करोड़; छोटे कर्जदारों से 74 प्रतिशत रकम वापस
क़र्ज़ वसूली की व्यवस्था में बड़े और छोटे कर्जदारों के बीच भारी अंतर सामने आया है। केंद्रीय बैंक ऑफ इंडिया से सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी ने बैंकिंग व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2016-17 से 2025-26 के बीच 100 करोड़ रुपये से अधिक बकाया वाले बड़े कर्जदारों के 26,701.55 करोड़ रुपये के कर्ज तकनीकी रूप से बट्टे खाते में डाले गए। लेकिन बैंक इनमें से केवल 3,874.41 करोड़ रुपये ही वसूल सका। यानी बड़े कर्जदारों से वसूली की दर महज 14.5 प्रतिशत रही।
इसके उलट, एक करोड़ रुपये से कम के कर्जदारों के मामले में बैंक ने 6,774.23 करोड़ रुपये के कर्ज बट्टे खाते में डाले और 5,004.28 करोड़ रुपये की वसूली की। यहां वसूली दर करीब 74 प्रतिशत रही।
59 प्रतिशत अंक का भारी अंतर
आंकड़ों की तुलना करें तो छोटे और बड़े कर्जदारों की वसूली दर में करीब 59.5 प्रतिशत अंक का अंतर है।
यानी जिन छोटे कर्जदारों के खिलाफ बैंकों की वसूली प्रक्रिया अपेक्षाकृत सख्त दिखाई देती है, उनसे बट्टे खाते में डाली गई राशि का बड़ा हिस्सा वापस आया। वहीं 100 करोड़ रुपये से अधिक बकाया वाले बड़े कर्जदारों से वसूली का अनुपात बेहद कम रहा।
2018-19 में 7,000 करोड़ से ज्यादा का कर्ज बट्टे खाते में
वित्त वर्ष 2018-19 में बड़े कर्जदारों के सबसे अधिक कर्ज बट्टे खाते में डाले गए। इस वर्ष 7,002.58 करोड़ रुपये के कर्ज बट्टे खाते में डाले गए, जबकि वसूली केवल 761.01 करोड़ रुपये रही।
वित्त वर्ष 2024-25 में भी 2,255.61 करोड़ रुपये के बड़े कर्ज बट्टे खाते में डाले गए, लेकिन वसूली सिर्फ 53.42 करोड़ रुपये हो सकी।
बड़े कर्जदारों के नाम बताने से बैंक ने किया इनकार
सूचना के अधिकार के तहत बड़े कर्जदारों के नाम और उनके खातों में बट्टे खाते में डाली गई रकम का विवरण भी मांगा गया था। लेकिन बैंक ने यह जानकारी देने से इनकार कर दिया।
बैंक ने इसे तीसरे पक्ष से संबंधित निजी जानकारी बताते हुए जानकारी साझा करने से मना किया।
राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण या अन्य कानूनी मंचों के माध्यम से कम राशि स्वीकार करते हुए जिन कर्जों का निपटारा किया गया, उनके मामलों में कर्जदारों के नाम और छोड़ी गई रकम की जानकारी भी उपलब्ध नहीं कराई गई।
सवाल सिर्फ कर्ज का नहीं, व्यवस्था की प्राथमिकताओं का भी
सूचना के अधिकार से सामने आए ये आंकड़े अब यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या बैंकिंग व्यवस्था में छोटे और बड़े कर्जदारों के लिए वसूली के मानक वास्तव में समान हैं?
छोटे कर्जदारों से जहां कर्ज की वसूली के लिए लगातार दबाव, नोटिस और संपत्ति नीलामी जैसी कार्रवाई देखने को मिलती है, वहीं बड़े कर्जदारों से जुड़े हजारों करोड़ रुपये के कर्ज में इतनी कम वसूली क्यों हो रही है—यह सवाल अब सार्वजनिक बहस का विषय बन गया है।
बट्टे खाते में डालना कर्ज माफी नहीं
हालांकि यह भी महत्वपूर्ण है कि कर्ज को तकनीकी रूप से बट्टे खाते में डालना कर्ज माफी नहीं होता। इसका अर्थ सामान्यतः बैंक की लेखा पुस्तकों से खराब कर्ज को हटाना होता है। कर्जदार से वसूली का कानूनी अधिकार समाप्त नहीं होता।
लेकिन जब दस वर्षों में बड़े कर्जदारों के 26,701 करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज बट्टे खाते में डाले जाएं और उनमें से केवल 14.5 प्रतिशत की ही वसूली हो, जबकि छोटे कर्जदारों से करीब 74 प्रतिशत रकम वापस आ जाए, तो बैंक की वसूली व्यवस्था और पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सूचना के अधिकार से सामने आए ये आंकड़े अब एक बड़ा सवाल छोड़ते हैं—क्या कर्ज वसूली का बोझ मुख्य रूप से छोटे कर्जदारों पर ही है, जबकि बड़े कर्जदारों के मामले में व्यवस्था अपेक्षाकृत नरम है?
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