सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने कहा है कि भारत में अलग-अलग विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए उपलब्ध सार्वजनिक स्थान लगातार सिमटते जा रहे हैं। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करने वाले छात्रों को गिरफ्तार किया जा रहा है और कई मामलों में उन्हें जमानत तक नहीं मिलती।
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि जब ऐसे छात्रों को जमानत मिल भी जाती है, तब भी अदालतों द्वारा कई बार ऐसी कठोर और प्रतिबंधात्मक शर्तें लगाई जाती हैं, जो उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वह किसी विशेष मामले पर टिप्पणी नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “मैं किसी व्यक्तिगत मामले पर टिप्पणी नहीं करूंगा,” लेकिन नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और विरोध के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़े इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है।
न्यायमूर्ति भुइयां की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन और जमानत संबंधी न्यायिक प्रक्रिया को लेकर व्यापक बहस चल रही है। उनके विचारों को लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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