प्रसिद्ध हेपेटोलॉजिस्ट और चिकित्सा विज्ञान संचारक डॉ. साइरिएक एबी फिलिप्स, जिन्हें सोशल मीडिया पर ‘द लिवर डॉक’ के नाम से जाना जाता है, ने केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित गोमूत्र संबंधी एक शोध पत्र की वैज्ञानिक विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने अध्ययन में कथित खामियों की जांच कराने तथा शोध की वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा की समीक्षा की मांग की है।
यह शोध पत्र पिछले वर्ष एप्लाइड बायोकैमिस्ट्री एंड बायोटेक्नोलॉजी नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ था। अध्ययन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी-बीएचयू), वाराणसी तथा बिरला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान (बिट्स), पिलानी के शोधकर्ताओं द्वारा केंद्र सरकार के एसयूटीआरए-पीआईसी (Scientific Utilization through Research Augmentation – Prime Products from Indigenous Cows) कार्यक्रम के तहत किया गया था। डॉ. फिलिप्स के अनुसार इस परियोजना के लिए सार्वजनिक धन से 31.04 लाख रुपये की सहायता प्रदान की गई थी।
सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर किए गए अपने पोस्ट में डॉ. फिलिप्स ने दावा किया कि शोध पत्र की प्रकाशन के बाद विस्तृत समीक्षा की गई है और इसके संबंध में स्प्रिंगर नेचर की एथिक्स टीम तथा जर्नल के संपादकों को औपचारिक शिकायत भेजी गई है। उन्होंने शोध पत्र के संबंध में ‘एक्सप्रेशन ऑफ कंसर्न’ जारी करने और वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा की जांच की मांग की है।
डॉ. फिलिप्स का आरोप है कि शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में उपयोग होने वाले प्लास्टिक और सॉल्वेंट्स से उत्पन्न सामान्य रासायनिक प्रदूषकों को गोमूत्र में स्वाभाविक रूप से मौजूद यौगिकों के रूप में पहचान लिया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अध्ययन में ऐसे कृत्रिम रसायनों, कीटनाशकों और दवाओं की उपस्थिति का दावा किया गया है, जिनका गोमूत्र में पाया जाना जैविक दृष्टि से अत्यंत असंभव प्रतीत होता है।
उन्होंने शोध पत्र में किए गए स्वास्थ्य संबंधी दावों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि जिन रसायनों को कैंसररोधी और जीवाणुरोधी गुणों वाला बताया गया है, वे अध्ययन के वास्तविक आंकड़ों में स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते। इसके अलावा उन्होंने शोध पत्र में पाठ और आंकड़ों के बीच विरोधाभास, संदर्भों की त्रुटियां, सांख्यिकीय विश्लेषण के अभाव तथा अत्यंत सीमित नमूनों के उपयोग जैसी कमियों का भी उल्लेख किया।
डॉ. फिलिप्स के अनुसार अध्ययन में गायों की आयु, आहार और भौगोलिक परिस्थितियों जैसे महत्वपूर्ण कारकों को अलग-अलग नहीं किया गया, जिससे विभिन्न नस्लों के बीच तुलना और निष्कर्षों की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। उन्होंने शोध पत्र में प्रकाशित कुछ ग्राफ और चित्रों की प्रस्तुति पर भी सवाल उठाए हैं।
यह विवाद एक बार फिर पारंपरिक या स्वदेशी उत्पादों से जुड़े अनुसंधानों पर सार्वजनिक धन के उपयोग और ऐसे अध्ययनों में वैज्ञानिक मानकों के पालन को लेकर बहस को तेज कर सकता है।
हालांकि, अभी तक शोध पत्र के लेखकों, संबंधित संस्थानों अथवा जर्नल की ओर से इन आरोपों पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। शोध पत्र फिलहाल प्रकाशित है और मामले में किसी आधिकारिक कार्रवाई की घोषणा नहीं की गई है। डॉ. फिलिप्स द्वारा लगाए गए आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण संबंधित जर्नल और प्रकाशक द्वारा की जाने वाली समीक्षा के बाद ही हो सकेगा।
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