संसद के आगामी सत्र में लोकसभा में पेश किए जाने वाले तीन अहम विधेयकों को लेकर राजनीतिक माहौल गरमा गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि इन विधेयकों का उद्देश्य परिसीमन प्रक्रिया को प्रभावित कर आगामी चुनावों में राजनीतिक लाभ हासिल करना है।
राहुल गांधी ने कहा कि सरकार जिन तीन विधेयकों को सदन में ला रही है, उनका मकसद निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को इस तरह बदलना है जिससे सत्तारूढ़ दल को फायदा मिले। उन्होंने विशेष रूप से प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयक पर चिंता जताते हुए कहा कि यह लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरनाक हो सकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि विपक्ष इस संविधान संशोधन बिल का हरसंभव तरीके से विरोध करेगा। “हम संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए जो भी जरूरी होगा, वह करेंगे,” उन्होंने कहा।
राहुल गांधी ने पहले भी आरोप लगाया था कि भारत का परिसीमन आयोग की शक्तियों को लेकर सरकार ऐसे कदम उठा सकती है, जिससे निष्पक्षता पर सवाल खड़े हों। उन्होंने असम और जम्मू कश्मीर के परिसीमन का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया कि वहां निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन इस तरह किया गया, जिससे विपक्षी क्षेत्रों को विभाजित कर राजनीतिक लाभ उठाया जा सके। उनके अनुसार, कुछ सीटों में मतदाताओं की संख्या में भारी अंतर देखने को मिला है और कई क्षेत्रों को भौगोलिक रूप से असंगत तरीके से बांटा गया है।

उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को जानबूझकर इस तरह बदला जाता है कि किसी एक पार्टी को फायदा मिले।
राहुल गांधी के अनुसार, कुछ लोकसभा सीटों में मतदाताओं की संख्या करीब 25 लाख तक है, जबकि कुछ सीटों में यह संख्या केवल 8 लाख के आसपास है। उन्होंने इसे प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के खिलाफ बताते हुए कहा कि इससे मतदाताओं के अधिकारों में असंतुलन पैदा होता है।
उन्होंने आगे कहा कि कुछ संसदीय क्षेत्रों में 12 तक विधानसभा खंड शामिल हैं, जबकि अन्य में यह संख्या केवल 6 है। उनके मुताबिक, इस तरह की असमान संरचना चुनावी संतुलन को प्रभावित कर सकती है।
विपक्ष के नेता ने यह भी आरोप लगाया कि कई सीटों की सीमाएं इस तरह तय की गई हैं कि वे भौगोलिक रूप से असंगत हैं। “कुछ निर्वाचन क्षेत्रों को बिना किसी तार्किक जुड़ाव के टुकड़ों में बांटा गया है, जो नदियों या पहाड़ों से अलग होते हैं,” उन्होंने कहा।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि परिसीमन पारदर्शी और सर्वसम्मति से नहीं किया गया, तो इससे देश के विभिन्न राज्यों और समुदायों के प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, केंद्र सरकार की ओर से इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। सरकार पहले भी इस तरह के आरोपों को खारिज करते हुए कहती रही है कि सभी विधायी और संवैधानिक प्रक्रियाएं नियमों के तहत और लोकतांत्रिक ढांचे में ही की जाती हैं।
संसद में इन विधेयकों पर चर्चा के दौरान तीखी बहस और राजनीतिक टकराव के आसार हैं। विपक्ष ने संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाएगा।
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