इस वर्ष भारतीय शेयर बाजारों से विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने रिकॉर्ड ₹3,04,217 करोड़ की निकासी की है, जो अब तक की सबसे बड़ी निकासी मानी जा रही है।

FIIs की इस व्यापक निकासी के प्रमुख कारण👇

1.चीन में प्रोत्साहन उपायों की घोषणा: चीन ने हाल ही में अपनी धीमी होती अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए मौद्रिक नीतियों में ढील और सरकारी खर्च में वृद्धि जैसे प्रोत्साहन उपायों की घोषणा की है, जिससे वैश्विक निवेशक चीन की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

2.भारतीय बाजार का उच्च मूल्यांकन: भारतीय शेयर बाजार का मूल्य-आय (P/E) अनुपात ऐतिहासिक औसत से ऊपर होने के कारण, निवेशकों को यह अपेक्षाकृत महंगा लग रहा है, जिससे वे अपने निवेश को अन्य उभरते बाजारों की ओर स्थानांतरित कर रहे हैं।

3.मुद्रास्फीति में वृद्धि: सितंबर 2024 में मुद्रास्फीति 5.49% तक पहुंच गई, जो इस वर्ष का उच्चतम स्तर है। उच्च मुद्रास्फीति उपभोक्ता खर्च को कम करती है, जिससे कंपनियों के लाभ पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और निवेशकों की धारणा प्रभावित होती है।

4.दूसरी तिमाही के कमजोर वित्तीय परिणाम: वित्तीय वर्ष 2024-25 की दूसरी तिमाही में भारतीय कंपनियों का शुद्ध लाभ केवल 3.6% बढ़ा, जो पिछले 17 तिमाहियों में सबसे धीमी वृद्धि है। यह कमजोर राजस्व वृद्धि और बढ़ती लागतों के कारण हुआ, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ी है।

5.भारतीय रुपये का अवमूल्यन: FIIs की निकासी के कारण अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ी है, जिससे भारतीय रुपये का मूल्य घटा है। रुपये के कमजोर होने से आयात महंगे हो जाते हैं और अर्थव्यवस्था पर मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ता है।

6.वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव: अंतरराष्ट्रीय व्यापार विवादों और अन्य भू-राजनीतिक तनावों के चलते FIIs उभरते बाजारों में अपने निवेश को कम कर रहे हैं, जिससे भारतीय बाजार भी प्रभावित हो रहा है।

FIIs की इस बड़े पैमाने पर निकासी के बावजूद, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) की खरीदारी ने बाजार को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अक्टूबर 2024 में, DIIs ने भारतीय इक्विटी में लगभग ₹1.07 लाख करोड़ की खरीदारी की, जिससे बाजार में संतुलन बना रहा।

हालांकि, FIIs की निकासी से बाजार में अस्थिरता बढ़ी है और प्रमुख सूचकांकों में गिरावट दर्ज की गई है। विशेषकर, ब्लू-चिप और बड़ी कंपनियों के शेयरों में दबाव देखा गया है, जहां FIIs की हिस्सेदारी अधिक होती है।

FIIs की इस ऐतिहासिक निकासी के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारक हैं, जिनमें चीन के प्रोत्साहन उपाय, भारतीय बाजार का उच्च मूल्यांकन, बढ़ती मुद्रास्फीति, कमजोर वित्तीय परिणाम, रुपये का अवमूल्यन और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव शामिल हैं। हालांकि, DIIs की सक्रियता ने बाजार को स्थिर बनाए रखने में मदद की है, लेकिन निवेशकों को सतर्क रहने और बाजार की गतिशीलता पर नजर रखने की आवश्यकता है।

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