सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के क्रीमी लेयर से जुड़े मानदंडों में बड़ा बदलाव करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल वेतन के आधार पर किसी व्यक्ति को क्रीमी लेयर नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि माता-पिता समूह-चार (ग्रुप-डी) सरकारी सेवा में कार्यरत हैं, तो उनकी वेतन आय और कृषि आय को क्रीमी लेयर की गणना में शामिल नहीं किया जाएगा। अदालत के अनुसार केवल अन्य स्रोतों से होने वाली आय—जैसे व्यवसाय, संपत्ति या निवेश से प्राप्त आय—ही क्रीमी लेयर निर्धारण के लिए देखी जाएगी और यह आय लगातार तीन वर्षों तक आठ लाख रुपये वार्षिक से कम होनी चाहिए।

अदालत ने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के वर्ष 2004 के पत्र के पैरा-9 को अवैध ठहराते हुए कहा कि यह प्रावधान कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, बैंकों या निजी क्षेत्र में कार्यरत अभिभावकों के वेतन के आधार पर सीधे क्रीमी लेयर तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए पहले इन पदों की सरकारी सेवाओं के समकक्ष श्रेणियों से तुलना करना आवश्यक होगा, उसके बाद ही 1993 के कार्यालय ज्ञापन के नियम लागू होंगे।

इस फैसले से उन कई ओबीसी अधिकारियों और कर्मचारियों को राहत मिलने की संभावना है, जिन्हें क्रीमी लेयर की गलत व्याख्या के कारण आरक्षण के लाभ से वंचित कर दिया गया था। ऐसे मामलों में अब पदोन्नति और कई मामलों में अखिल भारतीय सेवाओं में कैडर परिवर्तन का रास्ता भी खुल सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को निर्देश दिया है कि वह इस निर्णय को पिछली तिथि से लागू करे और छह महीने के भीतर आवश्यक कार्रवाई पूरी करे। यदि आवश्यकता पड़े तो बिना वरिष्ठता या अन्य वर्गों के अधिकारों को प्रभावित किए अतिरिक्त पद सृजित किए जा सकते हैं।

इसके साथ ही अदालत ने कहा कि भविष्य में संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा सहित अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में जिला दंडाधिकारी या तहसीलदार द्वारा जारी वैध ओबीसी गैर-क्रीमी लेयर प्रमाणपत्र को प्राथमिकता दी जाएगी और केवल वेतन के आधार पर किसी अभ्यर्थी को क्रीमी लेयर मानकर अस्वीकार नहीं किया जा सकेगा।

इस निर्णय को ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामलों में एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला माना जा रहा है।

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