प्रसिद्ध यकृत रोग विशेषज्ञ सिरियाक एबी फिलिप्स (लिवर डॉक) और उनकी टीम द्वारा किए गए एक बड़े अध्ययन में आयुर्वेद, होम्योपैथी, सिद्ध, यूनानी और लोक-परंपरागत चिकित्सा में उपयोग होने वाले अनेक उत्पादों को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े किए गए हैं। यह अध्ययन उन रोगियों के मामलों पर आधारित है जिन्हें इन औषधियों के सेवन के बाद यकृत को नुकसान पहुंचने पर उपचार के लिए अस्पताल लाया गया।
शोध के प्रमुख शोधकर्ता आरिफ़ हुसैन हैं। अध्ययन के अनुसार यह विषय पर अब तक का सबसे विस्तृत विश्लेषणात्मक शोध है, जिसमें रोगियों के चिकित्सीय परिणामों और इन औषधियों के उपयोग के बीच संबंधों का अध्ययन किया गया।
रोचक तथ्य यह है कि इस शोध-पत्र की समीक्षा करने वालों में अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के आयुर्वेद के एक वरिष्ठ प्राध्यापक भी शामिल थे, जिन्होंने इसे प्रकाशन के लिए स्वीकृति दी।
३८६ उत्पादों की जांच
अध्ययन में ३८६ वैकल्पिक और पूरक चिकित्सा उत्पादों का विश्लेषण किया गया। इन औषधियों का सेवन करने वाले अनेक रोगियों में Acute-on-chronic liver failure (दीर्घकालिक यकृत रोग पर उत्पन्न तीव्र यकृत विफलता) नामक गंभीर और जानलेवा यकृत विफलता पाई गई। इस स्थिति से पीड़ित लगभग ४० प्रतिशत रोगियों की मृत्यु हो गई।
बिना विवरण वाले उत्पाद सबसे खतरनाक
शोध में पाया गया कि जिन उत्पादों पर घटक सूची, निर्माता का नाम या उत्पादन समूह संख्या अंकित नहीं थी, वे सबसे अधिक जोखिम भरे थे। तीन या उससे अधिक ऐसे बिना विवरण वाले उत्पाद लेने वाले रोगियों में मृत्यु दर ४२.९ प्रतिशत तक पहुंच गई।
विषैले धातुओं का खतरनाक स्तर
कई उत्पादों में पारा, सीसा, आर्सेनिक और कैडमियम जैसे विषैले धातु सुरक्षित सीमा से कहीं अधिक मात्रा में पाए गए। विशेष रूप से कैडमियम के संपर्क में आए रोगियों में दीर्घकालिक यकृत रोग पर उत्पन्न तीव्र यकृत विफलता होने की दर ७५.९ प्रतिशत पाई गई, जबकि अन्य रोगियों में यह २२.६ प्रतिशत थी।
आधुनिक औषधियां भी छिपाकर मिलाई गईं
लगभग एक-तिहाई उत्पादों में आधुनिक औषधियां छिपाकर मिलाई गई थीं। इनमें स्टेरॉयड, जीवाणुरोधी औषधियां और पीड़ा निवारक औषधियां शामिल थीं। इनमें कुछ औषधियां ऐसी थीं जो प्रतिबंधित हैं या यकृत को नुकसान पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं।
‘प्राकृतिक’ औषधियां भी हमेशा सुरक्षित नहीं
अध्ययन में पाया गया कि ४० प्रतिशत से अधिक उत्पादों में ऐसे वनस्पति तत्व थे जो यकृत के लिए हानिकारक माने जाते हैं। इनमें सामान्य रूप से उपयोग होने वाली जड़ी-बूटियां Giloy (गिलोय) और Ashwagandha (अश्वगंधा) भी शामिल हैं।
छिपे हुए पशु-आधारित घटक
लगभग एक-तिहाई उत्पादों में बिना जानकारी दिए पशु-आधारित घटक (दुग्ध उत्पाद, समुद्री उत्पाद या पशु अर्क) पाए गए। इससे शाकाहारी और धार्मिक आहार नियमों का पालन करने वाले लोगों के लिए भी चिंता बढ़ जाती है।
शोध के अनुसार बिना उचित नियमन के बाज़ार में बिकने वाली अनेक वैकल्पिक औषधियां यकृत के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। विशेषज्ञों ने लोगों को सलाह दी है कि किसी भी ऐसी औषधि का सेवन करने से पहले चिकित्सक की सलाह अवश्य लें और उत्पाद की विश्वसनीयता की जांच करें।
Lead Reseacher: @arifhussaintm
FULL PAPER (free to read):https://www.frontiersin.org/journals/gastroenterology/articles/10.3389/fgstr.2026.1784785/full?utm_source=F-NTF&utm_medium=EMLX&utm_campaign=PRD_FEOPS_20170000_ARTICLE
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